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रोमांटिक दर्द गजल, कविता, शायरी, संग्रह हिंदी में (Best Ghazal Collection)

Hindi Gazal collecation 


Best Ghazal Collection  गजल हम सभी को पसंद हैं हम भी हिंदी गजल संग्रह Hindi Ghazal collecation करके आप लोगों के पास पहुंचना  कोशिश कर रहे हैं ।

हिंदी गजल  विभिन्न विधा पर पर लिखी जाती है जैसे जिंदगी को समेटकर जिंदगी का अलग-अलग मोड़ पर अलग-अलग प्रकार के गजल लिखी जाती है।

हम भी गजल का  भिन्न-भिन्न प्रकार के समय परिस्थितियां को इंगित करने वाला हिंदी गजल Hindi Gazal collecation पर समेटने की कोशिश किया है आपको पसंद आया है तो जरूर हमें बताएं।  गलतियां कभी ना कभी होती रहता है इस गलतियां को सही करने के लिए आप लोगों का कमेंट हमको जरूरी है।

https://www.nepalishayari.com/2020/05/dosti-shayari-in-hindi.html
Gazal image


Best Ghazal Collection (ग़ज़ल संग्रह)



आज भी कमबख़्त दिल मेरा लगा है उसी का होने में
फ़र्क ना समझा जिसने  कभी  पीतल  और  सोने  में
आज  भी  कहीं  बसर  कर  रहा है वजूद उसका
तस्वीर छिपा के रक्खी है दिल के किसी कोने में

न जाने मुझसे दूर होने का क्या था सबब
क्यों  छोड़  गया वो मुझे   यूँ तन्हा रोने में
जो था एक वक़्त हंसता, खिलखिलाता चेहरा
बीत रही ज़िन्दगी उसकी अश्क़ों को पिरोने में

है  वो अब  मुझसे कोसों दूर    कहीं और खुशहाल
पर अब भी महक उसकी  बिखरी है मेरे बिछौने में
कभी जो मुलाक़ात हुई, तो पूछेंगे उससे
क्यों लगी है वो मेरा  रोम रोम भिगोने में

आज भी अम्बरसरिया भूला न उसकी बातों को
उमर गुज़ार ली हमने  उसकी यादों को संजोने में
आज भी कमबख़्त दिल मेरा लगा है उसी का होने में
फ़र्क ना समझा जिसने  कभी  पीतल  और  सोने  में

आज  भी  कहीं  बसर  कर  रहा है वजूद उसका
तस्वीर छिपा के रक्खी है दिल के किसी कोने में
न जाने मुझसे दूर होने का क्या था सबब
क्यों  छोड़  गया वो मुझे   यूँ तन्हा रोने में

जो था एक वक़्त हंसता, खिलखिलाता चेहरा
बीत रही ज़िन्दगी उसकी अश्क़ों को पिरोने में
है  वो अब  मुझसे कोसों दूर    कहीं और खुशहाल
पर अब भी महक उसकी  बिखरी है मेरे बिछौने में

कभी जो मुलाक़ात हुई, तो पूछेंगे उससे
क्यों लगी है वो मेरा  रोम रोम भिगोने में
आज भी अम्बरसरिया भूला न उसकी बातों को
उमर गुज़ार ली हमने  उसकी यादों को संजोने में


जिंदगी 

सभी  जीते  हैं,  
मगर ..कोई  सब कुछ आने के  
बाद  भी  दुखी  रहते है , 
 तो ..
कोई  लुटा के खुश  रहते हैं ..
सभी  जीते  हैं,  
मगर ...
कोई  सब कुछ आने के  
बाद  भी  दुखी  रहते है , 
तो ...
 कोई  लुटा के खुश  रहते हैं...!!


दम बहुत है

छोटे से दिल में गम बहुत है,
जिन्दगी में मिले जख्म बहुत हैं,
मार ही डालती कब की ये दुनियाँ हमें,
कम्बखत दोस्तों की दुआओं में दम बहुत है..!


 आदत 


पता नहीं कब सुधरेगी मेरी ये आदत
पता नहीं कब बदलाव आएगा मुझमें

पता नहीं कब सुधरूँगा मैं
पता नहीं कब इंसानियत जागेगी मुझमें

मैं वही तुच्छ इंसान हूँ
जो गलतियां कर भी , खड़ा सीना तान हूँ

किसी के लिए मैं आंखों का तारा
तो किसी के लिए मैं हैवान हूँ

किसी के लिए देवता
किसी के लिए शैतान हूँ

किसी के लिए बदनामी
किसी के लिए मैं शान हूँ

किसी के लिए कंस
किसी के लिए मैं श्याम हूँ

किसी के लिए रावण
किसी के लिए मैं राम हूँ

गुनाह करना फ़ितरत है मेरी
ना स्वीकार करना है आदत मेरी

इसी आदत की वजह से 
हुआ अपनों से दूर हूँ

न मानी कभी गलती अपनी
मैं इतना क्यों मग़रूर हूँ?

मुझ जैसों ने ही देश बदनाम किया
लड़कियों से दुर्व्यवहार, बड़ा ही नीच काम किया

फ़िर भी शर्म न आई मुझे
क्योंकि वक़्त रहते किसी ने भी
सज़ा न दिलवाई मुझे

करता रहा हमेशा मनमानी
किसी भी औरत की कदर न जानी

क्यों हुआ मैं ऐसा आख़िर पाबंदियां मुझपे 
क्यों ना लगाई गई

क्यों मेरी गलतियों को सराहा इस समाज ने
क्यों मेरी ऐसी आदत बनाई गई

तुम मर्द हो कर सकते हो कुछ भी
आखिर क्यों ये पाठ पढ़ाया गया

क्यों मेरी गलतियों पे भी
मुझे सीने से लगाया गया

काश घरवालों ने मुझपे भी लगाम कसी होती
जहाँ मैं गलत था
वहां क्यों न मुझे थप्पड़ लगाया गया

आख़िर क्यों बनने दी  इसे मेरी  आदत
जो कभी हुआ करती थी छोटी सी शरारत

क्यों हर वक़्त मेरी गलतियों
पे मिली मुझे ज़मानत 
मैं अकेला कसूरवार नहीं हूं इस ख़ता का
गर मैंने गुनाह किया तो समाज पे भी है लानत


खुद्दारी

जा के कोई कह दे, शोलों से चिंगारी से
फूल इस बार खिले हैं बड़ी तैयारी से 
बादशाहों से भी फेके हुए सिक्के ना लिए
हमने खैरात भी मांगी है तो खुद्दारी से


चैन

कहीं बेहतर है तेरी अमीरी से मुफलिशी मेरी,!!
चंद सिक्कों की खातिर तू ने क्या नहीं खोया है,!!
माना नही है मखमल का बिछौना मेरे पास,!!
पर तू ये बता कितनी रातें चैन से सोया है!!


इसीलिए


खुद की कमज़ोरीयों को जानती हूँ मैं,
इसीलिए मज़बूत हूँ मैं…

भेद-भरम को पहचानती हूँ मैं,
इसीलिए बेख़ौफ़ हूँ मै…

ग़लतियाँ भी कर चुकी हूँ मैं,
इसीलिए समझदार हूँ मैं…

दुखों से काफ़ी वाक़िफ़ हूँ मैं,
इसीलिए ख़ुश रह सकती हूँ मैं…

नफ़रत का शिकार हुई हूँ मैं,
इसीलिए अनुरागी हूँ मैं…

आँसू से शिकस्त नहीं होती हूँ मैं,
इसीलिए हँसा सकती हूँ मैं…

मेरी ख़ामियों को गिन सकती हूँ मैं,
इसीलिए खुबसूरत हूँ मैं…


ज़िन्दगी

पाने को कुछ नहीं
ले जाने को कुछ नहीं…
उड़ जाएंगे एक दिन तस्वीर से रंगों की तरह…
हम वक्त की टहनी पर
बैठे हैं परिंदों की तरह …
ना राज़ है “ज़िन्दगी”
ना नाराज़ है “ज़िन्दगी";
बस जो है,
वो आज है “ज़िन्दगी”…


आगाह करने वाला हूँ

ज़ालिम लोग समाज के, न काम के न काज के
न करे कोई रहम और न रही किसी में शरम

दुनियाँ घुटने टेकती है आगे,मिज़ाज़ जिनका हैं गरम
गर अंधा तुझें बनना नहीं,कर ले प्रकाशित तू करम

आ धर ले पैर तू जंगल में,शामिल हो जा दंगल में
मंगल कर तेरा अखाड़े में,लताड़ेंगे,पछाटेंगे,पछाड़ेंगे

सारे जला कर पापियों को स्वाहा करने आया हूँ
तुमको इस कल के आज में
आगाह करने आया हूँ मैं आगाह करने आया हूँ

सबके सामने करने वाला हूँ,तमाशा करने वाला हूँ
हवा में उड़ लो जितना तुम मिट्टी मिट्टी करने वाला हूँ

करूँ मैं बातें ख़री,लगे जो मिर्च हो जैसे लालहरी
What लगेगी सबकी you don't have to so worry
Coz
आशा में सुलगती आस की,चिंगारी भरने आया हूँ
हो चाहे कपड़ा जितना झूठा,धागा धागा करने आया हूँ

हाँ मैं आगाह करने आया हूँ मैं आगाह करने आया हूँ
आगाह करने वाला हूँ मैं आगाह करने वाला हूँ।
कितनी ठोकर मिलने वाली,सब बतलाने वाला हूँ।।

सुनकर तुम रुक जाओ कोई इसका औचित्य नहीं।
गर तुम ही डरने वाले हो,तो मानो मेरी बातें सत्य नहीं।।

जिसमें कोई मिथ्य नहीं,करता मूड़ वो कृत्य नहीं।
ख़ुद सच्ची दुनियाँ को मालूम,अपना ही ये सत्य नहीं।।

क़भी ग़लतफ़हमी भी छोड़ो औऱ,देखो दुनियाँ सच्ची भी।
किस दुनियाँ में हम रहतें है,बच सकती नहीं है बच्ची भी।।

बच सको जितना भी बच लो तुम,या खड़े लड़ने को रह लो तुम।
अपनी आवाज़ बुलन्द करो,या फ़िर मूक बनके ही रह लो तुम।।

पहले भी टेके थे,घुटने आज तुम फ़िर से टेकने वाले हो।
यही सब बतलाने वाला हूँ
आहाग करने वाला हूँ मैं आहाग करने वाला हूँ


सुनता कौन

दोगले से लोग करते चौगली सी बातें है
आइना ना देखते जिस मुँह से करतें बातें है
खातें है लात सोच पे,जो दुनियाँ की निकले खोज़ पे
भूखें है भोज के,रोजगार जिनके रोज के,
है पेट काटने के,सोच बाँटने के,धंदा राजनिती में
हो रहे शिकार तुम कामनीति में,अन्यायनीति से,
तुम्हारी आपवीती भी तलवे चाटने के बाद बीती
बात सीधी भी सुनता कौन,सबके आँख कान बन्द
तभी तो दिन भी लगता इनको रात आधी सी


देख लूँगा

सो रहें हैं सो रहें हैं वादे सारे भूल कर
रो रहे है रो रहे है मिट्टी दोमट धूल कर
पक गये टपक गये अब बातें ना फ़िज़ूल कर
हक़ का ये है सबका ये तू भी ये क़बूल कर
जो हाथ मुट्ठी अपने है छीनना ना भूलकर
देख लूँगा नहीं तो तेरे मैं,आर पार सूल कर

करना गलती क़ुबूल करना,तुमको सिखलाने वाला हूँ
आज तारे ज़मीन के सारे तुमको दिखलाने वाला 
आगाह करने वाला हूँ मैं आगाह करने वाला हूँ


किनारा 

जरुरी तो नहीं, जीने के लिए सहारा हो.!!!
जरुरी तो नहीं, हम जिनके हैं वो हमारा हो.!!!
कुछ  कश्तियाँ, डूब भी जाया करती हैं..!!!
जरुरी तो नहीं, कि, हर कश्ती का किनारा हो..।


ज़िन्दगी

पाने को कुछ नही  ले जाने को कुछ नहीं;
उड़ जाएंगे एक दिन..तस्वीर से रंगों की तरह!
हम वक्त की टहनी पर...बैठे हैं परिंदों की तरह !!
ना राज़ है... “ज़िन्दगी ना नाराज़ है... “ज़िन्दगी";
 बस जो है, वो आज है... “ज़िन्दगी”


बेरोज़गारी 


हाँ नौकरी मिल जाए तो अच्छा नही मिले तो बहिषकार ,
हाँ हमारे समाज के हैं वो लोग जो अब भी हैं  बेरोज़गार 

आशाएं बहुत है हमारी भी पर सुनना कौन चाह्ता है,
सपने हैं हमारे भी बहुत पर उन्हे बुन्ना कौन चाह्ता है ,

काश हमारे पास भी होती एक लम्बी कार ,
यूं मीलों तक पैदल नहीं चलना पड़ता मेरे यार,

एक एक रुपये बचाने के लिए नहीं सहना पड़ता भूख का अत्याचार ,
ये आया हमारे हिस्से बस इसलिए क्योंकि हम बेरोजगार हैं यार ,

आठ घन्टे काम करते लेकिन फिर भी नहीं भरता मन हमारा 
क्योंकि घर की टपकती छत ने छीन रक्खा है चैन हमारा,

न जाने कब बरसेंगी हमपे भी रहमत उपरवाले की
जाने कब करम देख हमें जानेगा जग सारा

बच्चे भी देखते हैं कि कब आयेगा अनाज और कब जलेगा चूल्हा हमारा,
क्यूँ अगर कोई महमान आ जाए तो क्यूँ नही आना चाह्ता दुबारा

मरें भी तो कहाँ मरे एक तरफ है खाई तो दुसरी तरफ है किनारा,
हाँ जिन्दगी ने भी हमे कुछ ऐसे है धितकारा
मरकर भी न मर सका वो बेरोज़गार बेचारा

इसी बेरोज़गारी ने छीना बचपन हमारा
देख रंगत ज़माने की आंखों में है लहू खारा खारा

आख़िर क्यों हुआ वो इतना मजबूर
जो बनना पड़ा उसे बाल मज़दूर

देख के हालात घर के छोड़ी उसने पढ़ाई
आख़िर घर चलाने का इक ज़रिया बचा कमाई

खेलने कूदने की उमर में, उसने ईंटें तक उठाई
बस इसी को तो कहते हैं बेरोज़गारी मेरे भाई।।

देख के हाल ज़माने के, आज दिल मेरा रोया है
कोई बर्बाद कर रहा अनाज, तो कोई भूखा रात सोया है

अमीर होता ही गया अमीर और ग़रीब आज भी गुमनाम खोया है
इस बेरोज़गारी ने मेरा रोम रोम भिगोया है

कोई दाने दाने का मोहताज़ है, तो किसी के सर पे ताज है
साथ दो फ़कीरों का भी गर तुम में थोड़ी भी लाज है

इस बेरोज़गारी की वजह से बनता रिश्ता टूट जाता है
समधी पहले पूछते हैं लड़का कितना कमाता है

क्यों गरीबों को अच्छी नौकरी नहीं मिलती
क्यों उसकी डिग्री छोड़, उसकी हैसियत देखी जाती है
कैसे बढ़ी ये बेरोज़गारी?
क्यों गरीबों की बेटियां कवारी रह जाती है

कुछ तो हल करना होगा हमें इस बीमारी का
अंत करना होगा यारों, हमें बेरोज़गारी का

देख के माहौल आज 'अम्बर' भी रोया संग 'रंगा' के
क्यों है इस ज़माने पे राज अत्याचारी का।।

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