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Love poem in Hindi, मेरी कलम मेरी शायरी, प्यार की कलम बिल्कुल इसी तरह

Love poem in Hindi


Hello friend's आज मैं love poem in Hindi पार प्यार के ऊपर एक स्त्री के ऊपर मिश्रित कविता लेकर आया हूं। प्यार पर कविता का साथ साथ कुछ इस तरह मेरी कलम मेरी शायरी, मां कलम पर ताकत का शायरी,  एक स्त्रीय पर, प्यार की कलम, फ्रेंड मानती हो बॉयफ्रेंड नहीं इस तरह का कविता इस पर मिलेगा।

love poem in Hindi सभी को पसंद वाले टॉपिक्स है गूगल फेसबुक पर ज्यादातर सर्च करने वाला प्यार की कविता हम अपनों के लिए कुछ इस तरह लिखकर उपस्थित है।एक स्त्री का ताकत कितना होता है क्या क्या कर सकती है सब कुछ इस कविता से दिखाने के पूरी कोशिश किया है।

अगर आप लोग को अच्छा लगेगा या फिर बुरा हमको किस तरह लिखना चाहिए आप लोग का किस प्रकार के कविता शायरी गजल पसंद है हो हमको जरूर बताइएगा मेरे कविता इस  प्रकार का है।

https://www.nepalishayari.com/2020/04/heart-touching-shayari-for-girlfriend.html

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कुछ इस तरह मेरी कलम मेरी शायरी

कुछ इस तरह उस ने मेरे मन को छुआ
जैसे चाँद ने आफ़ताबी बदन को छुआ
पहली मरतबा कोई क़रीब आने लगा है
बज़्म-ए-हर्ष ने जैसे अकेलेपन को छुआ
वस्ल-ए-मोहब्बत पे फ़ख़्र रहेगा मुझे, कि
हमने भी कभी किसी गुलबदन को छुआ
तेरी यादों के तरन्नुम साथ कहाँ छोड़ते हैं
ख़ामख़ा ही हमने जानी दुश्मन को छुआ
मुरझा गए गुलिस्तां मिरे बहारों के दिन में
जाने किस नामुराद रूह ने मेरे चमन को छुआ

माँ (Maa)- कलम की ताकत पर शायरी

इन फ़ज़ाओं को भी आज अब्र ने घेरा है
जाने कैसा आज का ये बेसब्र सवेरा है

तेरी आँचल की छाँव जन्नत जिसकी थी
चश्म के आगे उसके  छाया अंधेरा है

तेरे होते इक सर्द हवा का झोंका न चुभा
तुझे भी मैं खुशियाँ दूँ अब फ़र्ज़ ये मेरा है

ख़ुदा का शुक्र है के मुझे भी अवसर मिला
कुछ ख़ास नहीं मुझमे, कर्मों का ये फ़ेरा है

वक़्त रहते ममता की कद्र हमने भी न की
बड़ा ही नालायक निकला लल्ला ये तेरा है

तेरे रुख़सार की झुर्रियां भी तबस्सुम न ढक पाई
बेशक ग़ुबार-ए-हिज्र ने तोड़ा रिश्ता तेरा-मेरा है

शायद आख़री घड़ी कुछ दरार भर दे हमारे बीच के
सुना है अच्छे कर्मों वाले का जन्नत में बसेरा है

औरत (Woman) Must Read Please

औरत सिर्फ़ शब्द ये पढ़ना आता है,
या मतलब भी इसका कुछ समझ आता है।

क्या है औरत? कभी कोशिश ये जानने की करी,
या चाहिए ये ऐसे जब इसकी तुम्हें जरूरत पड़ी।

क्या कहूँ औरत के बारे में अब,
शब्द ये भी कम पड़ गए।

जो जान गए इन्हें सम्मान कुछ वो कर गए,
अब नसमझ का क्या कहें..
उन्हें समझाने में तो समझदार भी निकल गए।

औरत कोई वस्तु नहीं जिसे तुम ख़रीदने चले हो,
न ही कोई खेल वो जिसे तुम खेलने चले हो।

क्यों हर बार उँगलियाँ उठती है औरत पे?
क्यों कोई सवाल नहीं उठाया कभी पुरुषों पे?

वो करे तो सब सही,
औरत करे तो तानासाही।

क्यों भूल गए पुरूष कि जन्मा वो भी तो है एक औरत से?

आज भी बाल-विवाह होते हैं,
कहीं एक बच्ची के टूटे ख़्वाब भी रोते हैं।

आज भी शिक्षा का बँटवारा होता है,
आज भी बेटियां अनपढ़ रहती हैं।

आज भी इज़्ज़त लूटती है,
आज भी सिस्टम के नीचे कांड होते हैं।

आज भी स्त्री बिकती हैं,
आज भी दलाल बुलाये जाते हैं।

आज भी औरत हिफाज़त में नहीं,
आज भी मुँह-बंद करवाए जाते हैं।

आज भी बेटियों की खिलकारे कम,
आज भी बेटे अपनाये जाते हैं।

क्यों है ये समाज ऐसा?
क्यों यहाँ लोग हैं ऐसे?
क्यों औरत का सम्मान नहीं?
क्यों उनका कोई मान नहीं?
क्यों हर कोई है मौन यहाँ?
क्यों औरत को है ख़ौफ़ यहाँ?
क्यों आज़ाद वो उड़ती नहीं?
क्यों अकेले वो जाती नहीं?
क्यों है इतनी पाबंदी?
क्यों होती आये-दिन ये जबरदस्ती?

कोई जवाब हो तो दे-दो,
क्या किया जाए कभी ये भी तुम सोच लो।

औरत खिलौना नहीं है खिलवाड़ करना छोड़ दो,
चिक सुनके तुम किवाड़ बंद करना छोड़ दो।

बेटी तेरी हो, बेटी मेरी हो,
है तो वो औरत ही।

दर्द को उसके तुम महसूस करना सीख लो।

कैद है आज भी पिंजरे में आज़ाद पंछी,
कोई जाके उसे आज़ाद तो करा दो।

नारी को भड़कने में मजबूर न करो,
नारी की परीक्षा लेना ज़रा छोड़ दो।

जब भी ये बाद-ए-सबा छू के गुज़रती है मुझे
जाने क्यों लगता है कि तुमने पैग़ाम भेजा है
आज तक भागता रहता हूँ सदाओं के पीछे
के तू कहीं मिल जाएगी भावनाओं के पीछे

चश्म-तर हुए बैठे हैं रंगीन घटाओं के पीछे
जाने कैसा उभरता दर्द तूने मेरे नाम भेजा है
जब भी ये बाद-ए-सबा छू के गुज़रती है मुझे
जाने क्यों लगता है कि तुमने पैग़ाम भेजा है

 इसमें तेरी भी परछाई है

इस प्रेम के चक्कर में बहुत मार खाई है
हर गली हर मुहल्ले में हुई मेरी पिटाई है

वैसे तो लड़कियों पे ये ताना कसा जाता है
पर यारो मैंने भी अपनी नाक बड़ी कटवाई है

सबा हुई नहीं के चल दिये लड़कियां ताड़ने
देखो यारो आज वो क्या पटाखा बनके आई है

जब तक साँस चल रही है छड़े नहीं मरेंगे
छेड़ेंगे हर ऑन्टी को भी कसम हमने खाई है

लड़की ना हुई मानो कोई खिलौना हो गई
बच्चे से लेकर बुड्ढे तक ने उसपे नज़र गड़ाई है

हाँ करी तो खेला उसकी सहमती से
ना करी तो तेज़ाब डालने तक की नौबत आई है

इस नल्लेपन के जीवन से हवस इतना भर गया
कर रेप किसी मासूम का 2 पल की प्यास बुझाई है

इतना सब करके भी खुले सांड सा घूम रहा हूं
क्योंकि ज़माने ने रीत ही यही बनाई है

हाँ मैं बोल रहा हूँ, लफ़्ज़ों को न तोल रहा हूँ
'अम्बर' ने जो बात लिखी, इसमें तेरी भी परछाई है

उस का गीत विधान रहेगा।

जितना कम सामान रहेगा 
उतना सफ़र आसान रहेगा 
जितनी भारी गठरी होगी 
उतना तू हैरान रहेगा 

उस से मिलना ना-मुम्किन है 
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा 
हाथ मिलें और दिल न मिलें 
ऐसे में नुक़सान रहेगा 

जब तक मंदिर और मस्जिद हैं 
मुश्किल में इंसान रहेगा 
'नीरज' तू कल यहाँ न होगा 
उस का गीत विधान रहेगा।

इंसानियत बनो

मस्जिद पे गिरता है
मंदिर पे भी बरसता है
ए बादल बता तेरा
मजहब कौनसा है?

इमाम की तू प्यास बुझाए
पुजारी की भी तृष्णा मिटाए
ए पानी बता तेरा
मजहब कौन सा है?

मज़ारों की शान बढाता है
मूर्तियों को भी सजाता है
ए फूल बता तेरा
मजहब कौनसा है?

सारे जहाँ को रोशन करता है
सृष्टी को उजाला देता है
ए सूरज बता तेरा
मजहब कौनसा है?

मुस्लिम तूझ पे कब्र बनाता है
हिंदू आखिर तूझ में ही
विलीन होता है
ए मिट्टी बता तेरा
मजहब कौनसा है?

खुदा भी तू है
ईश्वर भी तू
पर आज बता ही दे
ए परवरदिगार..
आपका मजहब कौनसा है?

सोचकर यही मंदिर
मस्जिद भी दंग है
कि....
हमें ख़बर भी नहीं
और हमारी जंग है

ऐ दोस्त मजहब से दूर हटकर,
इंसान बनो
क्योंकि इंसानियत का
कोई मजहब नहीं होता

https://www.nepalishayari.com/2020/04/hindi-shayari-collection-2020.html
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प्यार की कलम

कया लिखूं तुझ पर
कुछ लफ्ज़ नहीं है
दरी का ऐहसास लिखूं
या बेपहान मोहब्बत की बात लिखूं
एक हसीन ख़्याल लिखूं
या तुमको अपनी जान लिखूं
तम्हारा खूबसूरत ख्याल लिखूं
या अपनी मोहब्बत का इजहार लिखूं
तने ही मुझे लिखा
अपने प्यार की कलम से
य मेरे प्यार बता
मैं तुझको किस तरह लिखू..

साथ तेरा हो अगले बरस भी
बिल्कुल इसी जनम की तरह
तेरी सादगी का दीद करें हम
खिलो किसी चमन की तरह
बदन तेरा  जून के महीने भी
लागे है मुझे शबनम की तरह
तेरे दिए नासूर ज़ख़म भी अब
लगते हैं मुझे मरहम की तरह
छोड़ न जाना हमें तुम कभी
किसी बेवफ़ा सनम की तरह
तेरे संग बिताऊँ ज़िन्दगी
ऐ यार मेरे हमदम की तरह
साथ तेरा हो अगले बरस भी
बिल्कुल इसी जनम की तरह

फ्रेंड मानती बॉयफ्रेंड नहीं

वो मुझे फ्रेंड कहती है बॉयफ्रेंड नहीं
वो मेरेको ढेर सारे मानती है सब कुछ नहीं

उसने देखा नहीं मुझे न वो मुझसे कभी मिली
मैं उससे अनजान वो मुझसे अनजान सी मिली

हमारा रिश्ता है केवल खतों के आदान-प्रदान का (चैटिंग)
या रिश्ता है ये विधि के विधान का

मैं उससे अनजान था वो मुझसे अनजान सी मिली
अब जानते हैं सब जबसे वो मुझे मिली

वो मुझे फ्रेंड कहती है बॉयफ्रेंड नहीं
वो मुझे बहुत कुछ मानती है सब कुछ नहीं

मैं उसे बहुत कुछ मानता हूँ और सब कुछ भी सही
मैं उसे गर्लफ्रेंड कहता हूँ और फ्रेंड भी सही

वो गंगा का पर्याय है मैं साधु का अर्थ सही
वो कृष्णा कावेरी है मैं गंगा-यमुनी तहजीब सही

वो इडली-ड़ोसा-साँभर है मैं पूड़ी-कचौड़ी खीर सही
वो दक्षिण का पठार है मैं गोवर्धन पर्वत सही

वो हिन्द महासागर है मैं चंबल की घाटी सही
वो खुदा की इनायत है मैं ब्रह्मा की भूल सही

वो लुंगी वाला ड़ांस है मैं नागिन वाला ड़ांस सही
वो साउथ की एक्सन मूवी मैं बनारस वाला पान सही

वो मेरी मस्तानी बेगम है मैं उसका बाजीरॉव न सही
वो मेरी मुमताज है मैं उसका शाह-ए-जहाँ न सही

वो मेरी अनारकली है मैं उसका सलीम न सही
वो मेरी लैला जूलीयट है मैं उसका मजनू रोमियो न सही

मैं उसे बहुत कुछ मानता हूँ और सब कुछ भी सही
मैं उसे गर्लफ्रेंड कहता हूँ और फ्रेंड भी सही....

मैं भी तुम भी और रात भी यहीं हैं
मगर दोनों की सोच चादर ओढ़ कर सो गई...
अल्फ़ाज़ कहीं टहलने निकल गए
हालात ने आवाज़ को डरा रखा हैं
रात की ठण्ड साँसों के साथ जिस्म में उतर रही हैं...
बस ये चार आँखें एक दूसरे से पूछ रही हैं
तवील उम्र जीयेंगे या काटेंगे??
इसका जवाब कौन देगा
रात की ख़ामोशी या चाँद की ये रौशनी..
वो तेरी नज़रजो मुझे देखना चाहती तो है
पर अनदेखा कर जाती
उस नज़र से कहना...
एक बार, इस कदर
ये मेरी नज़रइंतज़ार में अक्सर
देर तक देखती रहती है उसे
कि वो भी मुझे देखे...
एक बार, इक नज़र

एक बार हमे भी आजमाने दे

ज़िस्म मिट्टी है मिल भी जाए तो भी क्या हासिल
तू तेरी रूह को मेरी रूह में उतर जाने दे....
समंदर सी मचल रही है जो, जन्मों की प्यास है
घूंठ दो घूंठ से क्या होगा, मुझे मयखाने दे....
मैंने जग के रातों को चाँद की तपिश देखी है
आँख की कोठरी में नींदों को चले आने दे...
तेरा वादा तुझ सा झूठा, ये सच है मालूम मुझे
आने कौन तुझे कहता है, पर कुछ तो नए बहाने दे
सामने आ ही जाएगी तेरी मेरी हक़ीक़त
वक़्त को एक बार हमे भी आजमाने दे... 
 ग़ज़ल
 क्या करूं तुझपे प्यार आये तो
       दिल ये तुझ पर ही यार आये तो। 
   दिल का वीरान है चमन कब से
 इस चमन में बहार आये तो। 
 जुस्तजू मेरी सिर्फ़ हो तुम ही
पर तुम्हें एतबार आये तो। 
कब से आवाज़ दे रहा हूं मैं
         सुन के बिछड़ा वो यार आये तो। 
       सौंप दूं ख़ुद को मैं ख़ुशी से पर
       बन कोई ज़िम्मेदार आये तो। 
गीत तारीफ़ में रचूं मैं भी
         करके दिलबर सिंगार आये तो।
बिना किसी चाहत के किसी को बेतहाशा चाहना ,

आसान होता है क्या इश्क निभाना !!

किसी की टूटी हुई उम्मीदों में नई हिम्मत जगाना

आसान होता है क्या किसीके एहसासों में

अपना नाम लिख पाना !!

अपनी जज़्बातों को खुद में समेटकर 

उसके जज़्बातों को समझना ,

आसान होता है क्या किसी की 

आँखों के आँसू को अपने आँखों की राह दिखाना !!

रौंदा गया हो , या चाहें ठुकरा दिया हो ...

हर पल बस उसके लिए उसके करीब होना ;

आसान होता है क्या उसका साया बनकर

उसे ही ना दिख पाना !!

बिना किसी चाहत के किसी को बेतहाशा चाहना ,

आसान होता है क्या इश्क निभाना !!


स्त्री एक शक्ति है, एक कल्पना है, एक सृजनकर्ता है, एक मां है

स्त्री वो है जिसे आजतक पुरुषों ने कभी समझा ही नहीं,

जब चाहा जैसे चाहा अपने इशारों पर नचाया,

कभी सती प्रथा तो कभी जौहर में झोंक दिया,

कभी जुए में हार गया तो कभी लोगों के कहने पर चरित्रहीन समझा,

कभी बाल विवाह तो कभी दहेज से उसका सौदा किया,

कभी पैरों में बेड़ियां तो कभी बेवजह की हुकूमत की,

कभी सामुहिक बलात्कार तो कभी एसिड अटैक किया,

कभी घरेलू हिंसा तो कभी तीन तलाक दिया,

अगर गौर करें तो इस समाज में स्त्री को

किसी तमाशा से कम नहीं समझा गया,

मुझे उतनी शिकायत पुरुषों से नहीं है जितनी स्त्री से,

स्त्री ने अपनी ज़िंदगी का मोल नहीं समझा,

अपनी ज़िंदगी की लड़ाई को ख़ुद नहीं लड़ी,

बस ख़ुद हारती चली गई

बेचारी करती भी क्या वो उस समाज में पली बढ़ी थी

जहां बचपन से ही उसने ख़ुद को अभिशाप माना,

कभी कोख में बेटियों को मार दिए जाने की ख़बर सुनती तो

कभी बेटों के लिए बेटियों की पूरी फौज को तैयार होते हुए देखा,

बचपन से यही सुना कितना भी तुम पढ़ लो खाना तुम्हें बनाना है

पति की सेवा, बच्चों की देख-रेख यह सब तुम्हारा होगा

और सुनो सहनशील बनकर रहना

तभी तो मेरी परवरिश की तारीफ़ होगी,

काश की हर मां ये कहती कि बेटी

इस समाज से लड़कर तुम्हें ख़ुद को काबिल बनाना होगा

तुम्हें अपनी तकदीर ख़ुद लिखनी होगी,

तुम भी आसमान में उड़ सकती हो

तुम भी हर वो काम कर सकती जो पुरुष करते हैं

कोई और इस लड़ाई में तुम्हारा साथ दे ना दे

मैं हमेशा तुम्हारी ढाल बनकर खड़ी रहूंगी,

क्या होगा अगर ये पुरुष समाज तुम्हें हरा ही जाएगा

कम से कम आने वाली पीढ़ी तो तुम्हें

शिकायत भारी नज़रों से नहीं दिखेगी

कम से कम हजारों सवाल उसके जेहन में दफ़न तो नहीं होंगे,

तुम उन सवालों का जवाब होगी, तुम मिसाल होगी,

तुम्हारी आत्मनिर्भरता, स्वतंत्रता उन्हें प्रेरित करेंगी,

उन्मुक्त होकर वो भी अपनी ज़िंदगी जीने के लिए लड़ेगी,

स्त्रियों को उसके वजूद से मुलाकात का ज़रिया बनोगी,

तब जाकर सही मायनों में मदर टेरेसा, कल्पना चावला,

जैसे अपने क्षेत्रों में विशिष्टता को हासिल करने वाली,

उन तमाम स्त्रियों की तरह

समाज की हर बेटियां अपनी सफलता की इबारत ख़ुद लिखेंगी।

कैसी लगी ? आपको यें स्त्री के बारे कुछ शब्द हमें ज़रूर बताए

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