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Inspirational poems in Hindi by famous poets

Inspirational poems in Hindi by famous poets Collocation 


Hello friend's आज मैं उत्साहित कविता लेकर आया हूँ भिन्न कवि का कविता  एक कविता का संग्रह बनाकर आपके पास हाजिर हूँ मैंने आपने हिसाब से अच्छे अच्छे कविता को चुनकर लिखा हूँ। 

Inspirational poems in Hindi by famous poets टाइटल देकर जीवनकी हर तरह का समय से मिलकर जुलकर दिल से ही मनो क्रांति लेकर आएगा दिलसे ही कुछ न कुछ करने का प्रेणा मिलेगा। 

आप  हर कोही फिल्ड पर जीवन संघर्ष कर रहे हो तो आपके लिए एक तगत की तरह काम कर सकता हैं उत्साहित होना दिल से काम करके आगे किसी ने उत्साहित करना खुद पर भरोसा करने की लिए भी एक मध्यम का जरुरत होती हैं। 

Inspirational poems in Hindi by famous poets पर ऐसाही कविता को लेकर आपको बाटने के लिए पूरी कोशिस हैं। 

https://www.nepalishayari.com/2020/06/motivational-poem-in-hindi.html
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इश्क़ की दुनिया है जनाब 

इश्क़ की दुनिया है जनाब यहाँ कुछ भी हो सकता है,

दिल मिल भी सकता है और खो भी सकता है। 

जिसे तुम चाहते हो किसी और का भी हो सकता है,

तुम समझो इबादत वोह गुनाह भी हो सकता है। 

बेपनाह मोहोब्बत का मामूली हाल भी हो सकता है,

दोस्त समझो जिसे वोह रकीब भी हो सकता है। 

जाम समझो जिसे वोह ज़हर भी हो सकता है,

सुकून समझो जिसे वोह कहर भी हो सकता है।  

अपना समझो जिसे वोह सपना भी हो सकता है

इश्क़ की दुनिया है जनाब यहाँ कुछ भी हो सकता है।❜

सर पे लेकर घूमता हू

मोहब्बत सर पे लेकर घूमता हूं।

क़यामत सर पे लेकर घूमता हूं।। 

मेरा दिल है किसी दिल की अमानत।

अमानत सर पे लेकर घूमता हूं।। 

अगर मिल जाएं तो उन पर उड़ेलूं।

शिकायत सर पे लेकर घूमता हूं।।

न अब तक काम आई मेरे, फिर भी।

शराफ़त सर पे लेकर घूमता हूं।।

बुज़ुर्गों ने जिसे ठोकर में रख्खा

वो दौलत सर पे लेकर घूमता हूं।। 

सियासत पांव में रख्खी है जब से।

हुकूमत सर पे लेकर घूमता हूं।। 

बताए ख्वाब की ताबीर कोई।

मैं तुरबत सर पे लेकर घूमता हूं।। 

मैं खाऊं ठोकरें लिख्खा है जिसमे।

वो किस्मत सर पे लेकर घूमता हूं।। 

बंधी है सर पे दस्तारे अदावत।

अदावत सर पे लेकर घूमता हूं।। 

है बेटी बाइसे रहमत जहां में।

मैं रहमत सर पे लेकर घूमता हूं।। 

लगाकर नारा-ए-तकबीर राशिद।

मैं नुसरत सर पे लेकर घूमता हूं।।

याद रह जाती है

तुम्हारी यादों को रोक पाना मुश्किल है,

न चाहते हुए भी तुमसे दूर जाना मुश्किल है,

ये दिल आपको कितना प्यार करता है,

ये सिर्फ चार लाइनों में बता पाना मुश्किल है। 

चाँद के बिना अँधेरी रात रह जाती है

साथ कुछ हसीन मुलाकात रह जाती है,

सच है जिंदगी कभी रूकती नहीं,

बस वक्त निकल जाता है और याद रह जाती है। 

चाँद के बिना अँधेरी रात रह जाती है

साथ कुछ हसीन मुलाकात रह जाती है,

सच है जिंदगी कभी रूकती नहीं,

बस वक्त निकल जाता है और याद रह जाती है।

इसी तरह तरसते रहेंगे हम

खुदी को मिलाके के, खुद में सिमट जाते हैं हम,

एक याद उसकी आती है फिर से बिखर जाते है हम।

जो दिल के आईने में हो, वही है प्यार के क़ाबिल,

वरना दीवार के क़ाबिल तो हर तस्वीर होती है। 

साफ़ दामन का दौर तो कब का खत्म हुआ साहब,

अब तो लोग अपने धब्बों पर गुरूर करने लगे हैं।

ठहाके छोड़ आये हैं अपने कच्चे घरों मे हम,

फिर से इस पक्के घर में बस मुस्कुराने का है।   

एक बात बोलूँ बड़ी बरकत है तेरे ईश्क में,

जब से हुआ है बढ़ता ही ज़ा रहा है। ?

किस कदर अजीब है ये सिलसिला-ए-इश्क़,

मोहब्बत तो कायम रहती है पर इन्सान टूट जाते है।

एक चाहत होती है, जनाब़ अपनों के साथ जीने की,

वरना पता तो हमें भी है कि ऊपर अकेले ही जाना है।

लगता है आँखों से अश्क़ों की तरह बरसते रहेंगे हम,

जिंदगी भर प्यार के लिए इसी तरह तरसते रहेंगे हम। ? 

याराना हुआ तो

जो मेरा है वो तेरा भी अफ़साना हुआ तो

समझे थे जिसे अपना वो बेगाना हुआ तो, 

क़स्बे की ज़ियारत का सफ़र करने चले हो

रस्ते में कहीं कोई सनम-ख़ाना हुआ तो, 

तुम क़त्ल से बचने का जतन ख़ूब करो हो

क़ातिल का अगर लहज़ा शरीफ़ाना हुआ तो, 

कम ज़र्फ़ को इतनी न मुहब्बत से पिलाओ

लबरेज़ अगर वक़्त का पैमाना हुआ तो, 

'बेकल' ने तुझे दुश्मन-ए-जानी ही कहा है

तुझ से जो अचानक कहीं याराना हुआ तो..!!

बहारों के फूल 

बहारों के फूल एक दिन मुरझा जायेंगे,

भूले से कहीं याद तुम्हें हम आ जायेंगे,

अहसास होगा तुमको हमारी मोहब्बत का,

जब कहीं हम तुमसे बहुत दूर चले जायेंगे। 

बहारों के फूल एक दिन मुरझा जायेंगे,

भूले से कहीं याद तुम्हें हम आ जायेंगे,

अहसास होगा तुमको हमारी मोहब्बत का,

जब कहीं हम तुमसे बहुत दूर चले जायेंगे।

धड़कन में तेरी डूब जाने को मन चाहता है!

इश्क में तेरे बर्बाद होने को दिल चाहता है!

कोई संभाले मुझे, बहक रहे है मेरे कदम!

बेवफ़ाई में तेरी मर जाने को दिल चाहता है!

किदर कू रख्खा

घुटना किदर कू रख्खा भेजा किदर कू रख्खा

टोपी कहाँ गयी रे जूता किदर कू रख्खा  

जाना कहाँ था ह्यांसे भटका इदर उदर मैं

रस्ता किदर कू रख्खा पैय्या किदर कू रख्खा  

वो चाँद भी जमींपर लाके दिखातौं ठैरो

जादू भरेसो खंबा, ह्यां था, किदर कू रख्खा  

पैरां में नाल ठोंकै कैकु चुपीच भगा रैं

खाली लगाम है बे, घोडा किदर कू रख्खा  

जो बात करनी सो वो अब्बीके अब्बी कर बा

जुम्मा किदर कु रख्खा, हफ्ता किदर कू रख्खा  

खिडकी में एक बुढ्ढा कित्ता तडप रां बावा

हरियाली देखनी थी, चष्मा किदर कू रख्खा 

अच्छे दिनो की बातां भोतीच मँहगी पड गई

कच्छा बी लेको जा रैं, कुर्ता किदर कू रख्खा  

हर पाँच साल कू ये, कैकु निका लगा रैं ?

दुल्हन को लेके जा रैं दुल्हा किदर कू रख्खा  

सुनके ये मंकी बाताँ बेहोश तीन बंदर

बापू तो चौक में हैं चरखा किदर कू रख्खा  

इन्सानियत रखेंगा तब्बीच खुदा मिलेंगा

काशी किदर कु रख्खी काबा किदर कू रख्खा  

मतले में गर हो मतलब तो ये ग़ज़ल है " आफ़त "

फिर बोलना ना मुझको मक्ता किदर कू रख्खा 

जाने क्या मुझसे ज़माना चाहता है!

मेरा दिल तोड़कर मुझे ही हसाना चाहता है!

जाने क्या बात झलकती है मेरे इस चेहरे से!

हर शख्स मुझे आज़माना चाहता है!

जलना होगा

अब सातवें आसमान पर चलना होगा,

अगर चमकना है तो पहले जलना होगा।

ये भी राहें मंजिल तलक तो ले जाएगी,

पहले कुछ ख्वाबों का दिल में पलना होगा।  

सारा जग कह रहा है मुझसे ना होगा ये सफर,

अगर हम चले भी तो राहों से ही मुड़ना होगा।

माना खामियां हैं कुछ मुझमे भी,

खुद के नज़रिए से सबको बदलना होगा। 

खबर कर दो उसे कि, अब हम ना लौटेंगे,

बीच अब मौत भी आये तो उसे मरना होगा।

अब सातवें आसमान पर चलना होगा,

अगर चमकना है तो पहले जलना होगा।

संस्कारो के खातिर

आँसु छुपाते रहे, सिर्फ तुम्हारी मुस्कान के खातिर.

चुपचाप दर्द सहते रहे, सिर्फ मोहब्बत के खातिर।

अपने आप को लुटाते रहे, सिर्फ तेरी खुशी के खातिर।

सबसे झगडते रहे, तेरे हक के खातिर। 

अपने सपने कुर्बान करते रहे, सिर्फ तेरे सपनो के खातिर।

चोट पोहचकर अपनो को, साथ तुम्हारा देते रहे,

सिर्फ पागल दिल के खातिर।

तुम छोड कर चले गये हमें, सिर्फ धन और शोहरत के खातिर।

फिर भी तुमसे नफरत नही करेंगे, अपनो के संस्कारो के खातिर।

गुलज़ार साहब ने कितनी खूबसूरती से बता दिया कि जिंदगी क्या है ?


कभी तानों में कटेगी,

कभी तारीफों में;

ये जिंदगी है यारों,

पल पल घटेगी !!

-पाने को कुछ नहीं,

ले जाने को कुछ नहीं;

फिर भी क्यों चिंता करते हो,

इससे सिर्फ खूबसूरती घटेगी,

ये जिंदगी है यारों पल-पल घटेगी!

बार बार रफू करता रहता हूँ,

..जिन्दगी की जेब !!

कम्बखत फिर भी,

निकल जाते हैं...,

खुशियों के कुछ लम्हें !!

-ज़िन्दगी में सारा झगड़ा ही...

ख़्वाहिशों का है !!

ना तो किसी को गम चाहिए,

ना ही किसी को कम चाहिए !!

-खटखटाते रहिए दरवाजा...,

एक दूसरे के मन का;

मुलाकातें ना सही,

आहटें आती रहनी चाहिए !!

-उड़ जाएंगे एक दिन ...,

तस्वीर से रंगों की तरह !

हम वक्त की टहनी पर...,

बेठे हैं परिंदों की तरह !!

-बोली बता देती है,इंसान कैसा है!

बहस बता देती है, ज्ञान कैसा है!

घमण्ड बता देता है, कितना पैसा है।

संस्कार बता देते है, परिवार कैसा है !!

-नाराज़ है... "ज़िन्दगी",

ना नाराज़ है... "ज़िन्दगी";

बस जो है, वो आज है, ज़िन्दगी!

-जीवन की किताबों पर,

बेशक नया कवर चढ़ाइये;

पर...बिखरे पन्नों को,

पहले प्यार से चिपकाइये !!

Mai Kaon Hun ...मैं कौन हूँ ?

मैं कौन हूँ , दिल मेरा यही सवाल देता है ....,

उसके नजरिये से कुछ और ,  

तो किसी और के नजरिये से कुछ और रहता है !

मेरी पहचान क्या , पहनावा क्या ... मेरी बिंदी मेरा धर्म बताती है  

मेरी बोली , मेरी भाषा ..... मेरे मजहब का चुनाव करती है

मेरी चाल पर भी कभी कभी लोग बवाल कर देते है  

है तू उस मिट्टी का कीमत नही तुझे इस मिट्टी की मुझे अजीब सुझाव देते है

ठहराव देते है , कई शख्स मुझे इंसान होने का सवाल देते है 

जो गैर जाती को इंसान के ही जाती का राक्षस बताते है

कुछ लोग ऐसे भी है जो बर्बादियों को मकाम मानते है  

मैं देवी किसी के आँखो में तो किसी की आँखों मे बली की पूंजी बन जाती हूँ

कोई देता है हाथ में आरती की थाल तो किसी की थाली की सजावट मैं बन जाती हूँ  

परास्त कर देते है कुछ इंसान , इंसानियत ही हदो को जिन्हें मैं मानती हूँ

बना बैठे है कुछ लोग अपने ही नियमो को , जिन्हें मानने से मैं इनकार करती हूँ !!

https://www.nepalishayari.com/2020/04/hindi-shayari-collection-in-english.html
Shayari photo

शायद हमसे नहीं

मेरी वफ़ा की कदर ना की,

अपनी पसंद पे तो ऐतबार किया होता,

सुना है वो उसकी भी ना हुई,

मुझे छोड दिया था उसे तो अपना लिया होता

वोह खुश हैं पर शायद हम से नहीं

वोह नाराज हैं पर शायद हमसे नहीं

कौन कहता हैं उनके दिल में मोहब्बत नहीं

मोहब्बत तो हैं पर शायद हमसे नहीं

ज़िन्दगी हैं नादान इसलिए चुप हूँ,

दर्द ही दर्द सुबह शाम इसलिए चुप हूँ

कह दू ज़माने से दास्तान अपनी,

उसमे आएगा तेरा नाम इसलिए चुप हूँ

आखिरी निशानी है

यह ग़ज़लों की दुनिया भी बड़ी अजीब है,

यहाँ आँसुओं के भी जाम बनाये जाते हैं,

कह भी दे अगर दर्द-ए-दिल की दास्तान,

फिर भी वाह-वाह ही पुकारा जाता है।

हर ज़ख़्म किसी ठोकर की मेहरबानी है,

मेरी ज़िंदगी की बस यही एक कहानी है,

मिटा देते तेरे दिए हर दर्द को सीने से,

पर ये दर्द ही तो उसकी आखिरी निशानी है।

हर ख़ुशी के पहलू हाथों से छूट गए,

अब तो खुद के साये भी हमसे रूठ गए,

हालात हैं अब ऐसे ज़िंदगी में हमारी,

प्यार की राहों में हम खुद ही टूट गए।

इश्क करने वालों का यही हश्र होता है,

दर्द-ए-दिल होता है, रह रह के सीने में,

बंद होंठ कुछ ना कुछ गुनगुनाते ही रहते हैं,

खामोश निगाहों का भी गहरा असर होता है।

अम्बर आशियाने में

कैसी मुझसे चूक हुई यारों इश्क़ निभाने में

बेतहाशा चाह कर भी तन्हा रहा ज़माने में

पूछते तो सब हैं मेरी खोमोशी का सबब

लब थरथराते हैं  नाम उसका बतलाने में

दुख अगर हुआ हो तुम्हे कभी मेरी बातों से

माफ़ कर दीजिएगा ग़लती हुई अनजाने में

ये वादियां और शोखियां नही भाती अब

दिल-जलों को पनाह मिलती है वीराने में

कभी नाम भर से तेरे आ जाती थी मुस्कान

अब सुकून नहीं मिलता डूबे हैं मयख़ाने में

तक़दीर पे अपनी मैं इतराना कैसे छोडूं भला

चाँद रहता था कभी 'अम्बर' के आशियाने में

पीरी ख़ुदारा हो गया

ये  कैसा  मुझ पे  तोहमत  का  इशारा  हो  गया

हर गली-मुहल्ले मेरी तिश्नगी का नज़ारा हो गया

राह-ए-मंज़िल-ए-मोहब्बत से मेंरे कदम क्या गुज़रे

आवारगी-पसंद  जो  न था, वो भी आवारा हो गया

हर किसी की  नज़रों में अब रक़ीब  नज़र आता है

खटकती है दुनिया सारी अदू ज़माना सारा हो गया

दीवानगी कह लो या फ़िर पागलपन की ऊँचाईयां

इक शख़्स के लिए मर-मिटना भी गवारा हो गया

क्या नुकसान पहुंचाऊंगा मैं उसे ख़यालों में कभी

अबरू की तेग़ जिसकी बीमार का चारा हो गया

वल्लाह क्या नज़ारा है सीढियों पे हमसफ़र की

कोई तो है जहाँ में जो काफ़िर का सहारा हो गया

इश्क़ में "अम्बर" फ़क़ीरी  ही रास आई हमें

कूचा-ए-यार ही मेरी पीरी ख़ुदारा हो गया।।

I'm not a loser - में कमजोर नहीं हूँ

हूँ तिनका समंदर का

पर खारा नहीं हूँ

हैरां हूँ, मगर हारा नहीं हूँ।।

दो गुनी रफ़्तार से आई है

मुसीबतों के द्वार से आई है

करती है कोशिशें डुबोने की मुझे

ज़रूर ये हवाएँ.....

 मौसम-ए-बाहर से आई है

हाँ टूटे मेरे ख़्वाब

पर संभलना आ गया

तकलीफ़ में ज़रूर हूँ

हालातों का मारा नहीं हूँ

हैरां हूँ, मगर हारा नहीं हूँ।।

कोई तो ऐसी कला हो

जहाँ बीज मेरा फला हो

करूँ मैं भी कुछ अनोखा

ज़माना बोले तेरा भला हो
ये सफ़लता की जो कड़ी है
कमबख़्त ज़िद्दी बड़ी है
जपते रहो माला लाख
हो कुछ न पायेगा
शिद्दत से जो किया कार्य
ये उसके ही द्वार खड़ी है

ख़याल बुनता 

चकनाचूर अरमानों  के खाल बुनता है

ये कौन है जो इश्क का जाल बुनता है

शनासाई की शब भर अंधियारे से हमने

फ़िर भी दिल रौशनाई के सवाल बुनता है

ज़िन्दगी का पैरहन अब हो रहा है मैला

ज़र्रा ज़र्रा मिरा लाचारी का हाल बुनता है

ख्वाबों की कश्ती फँसी है मेरी ग़ुबार में

नाउम्मीदाना सी बचाव की ढाल बुनता है

न की कभी हमने तमन्ना अप्सरा-ए-फ़लक की

'अम्बर' बस कूचा-ए-यार के ख़याल बुनता है

तू मौला 

अपना जलवा दिखा दे तू मौला ।

खार को गुल बना दे तू मौला।

चढ़ के सर जो हमारे है बैठी ।

ये मुसीबत उठा दे तू मौला ।

हमको दिखता नहीं है जो दुश्मन ।

जिस्म उसका जला दे तू मौला ।

चीन से वायरस जो है आया।

जड़ से इसको मिटा दे तू मौला ।

हैं मुआफी के हम नहीं काबिल ।

पर न ऐसी सजा दे तू मौला ।

मैंने कहा

उसने कहा शायर हूं ?

मैंने कहा माशा अल्लाह

उसने कहा दिवाना हूं ?

मैंने कहा सुब्हान अल्लाह,

उसने कहा धोखा नहीं दुंगा,

मैंने कहा अल्हमदोलिल्लाह

उसने कहा मोहब्बत करोगी ?

मैंने कहा अस्तगफिरूल्लाह

ज़रूरत क्या है ?

बेकसूर मकान से निकलने की ज़रूरत क्या है ?

मृत्यु से आंख मिलाने की ज़रूरत क्या है ?

सबको मालूम है बाहर की हवा है क़ातिल,

फाटक से क़ातिल से उलझने की ज़रूरत क्या है ?

ज़िन्दगी एक नियामत, इसे सम्हाल के रख,

क़ब्रगाहों को सजाने की ज़रूरत क्या है ?

दिल बहलने के लिए घर मे वजह हैँ काफ़ी,

फाटक से गलियों मे भटकने की ज़रूरत क्या है ?

मैं खुद भी सोचती हूँ...

मैं खुद भी सोचती हूँ ये क्या मेरा हाल है;

जिसका जवाब चाहिए, वो क्या सवाल है;

घर से चली तो दिल के सिवा पास कुछ न था;

क्या मुझसे खो गया है, मुझे क्या मलाल है;

आसूदगी से दिल के सभी दाग धुल गए;

लेकिन वो कैसे जाए, जो शीशे में बल है;

बे-दस्तो-पा हू आज तो इल्जाम किसको दूँ;

कल मैंने ही बुना था, ये मेरा ही जाल है;

फिर कोई ख्वाब देखूं, कोई आरजू करूँ;

अब ऐ दिल-ए-तबाह, तेरा क्या ख्याल है।

बुरी आँखे तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये,

कि अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये,

करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला,

यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये,

मगर किसी ने हमें हमसफ़र नही जाना,

ये और बात कि हम साथ साथ सब के गये,

अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिए,

ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये,

गिरफ़्ता दिल थे मगर हौसला नहीं हारा,

गिरफ़्ता दिल है मगर हौंसले भी अब के गये,

तुम अपनी शम्ऐ-तमन्ना को रो रहे हो,

इन आँधियों में तो प्यारे चिराग सब के गये।

देख रहे हो तुम

देख रहे हो ना उस फांसी के फंदे को तुम

लटक रहे उन चार दरिंदो को तुम.....

जब जब अपनी हदे पार करोगो तुम

तब तब बेमौत मारोगे तुम ......

गन्दी निगाहे से जो वार करोगे तुम

निकाल आंख,अंधे बनोगे तुम.....

देख रहे हो ना उस फांसी के फंदे को तुम

लटक रहे उन चार दरिंदो को तुम

किसी भी नारी का अपमान करोगे तुम

निर्भया , निर्भया का शोर हर बार सुनोगे तुम

समय है काबू कर लो ,अपने सवेंगों को तुम

वरना खुद के कातिल, खुद ही बनोगे तुम

देख रहे हो ना उस फांसी के फंदे को तुम

लटक रहे उन चार दरिंदो को तुम

हुआ करता था 

जो इश्क़ चिट्ठीयों से हुआ करता था,

वहीं इश्क़ सच्चा हुआ करता था ... .

इंतजार की तलब और चेहरे पर,

शर्म का पर्दा हुआ करता था......

दिल का हाल जो आंखो से बयां हुआ करता था,

वहीं इश्क़ सच्चा हुआ करता था ......

वीडियो कॉलिंग में वो मज़ा अब कहा,

जो माशूका के पायल की झंकार में हुआ करता था

चेहरे का नूर जो गालों पर हुआ करता था

वहीं इश्क़ सच्चा  हुआ करता था......

किसी की तस्वीर दिल पर छाप छोड़ जाती थी

तब गैलरी में कहां ये सब हुआ करता था....

नज़रे झुकाए जब दिलवर से सामना हुआ करता था

वहीं इश्क़ सच्चा हुआ करता था ....

उसकी सलामती के लिए दुआ मांगने के खातिर

शायद ही कोई शक्स हुआ करता है.....

तब तो गांव में कहीं दूर किनारे

मन्नत से लपटे धागे का कोई पेड़ हुआ करता था...

जो इश्क़ चिट्ठीयों से हुआ करता था,

वहीं इश्क़ सच्चा हुआ करता था .....

आपसा कुछ

रागिनी सी सुनाई दी सदा कुछ

मानो कुबूल हुई मेरी दुआ कुछ

आज तक तो कुछ भी न हुआ

पर जब तुझे देखा तो हुआ कुछ

जी करता है क़रीब आ के तेरे

करूं दिल की बातें बयाँ कुछ

क्या रूप पाया है गुलबदन ने

जैसे हो गुलाब-ए-गुलसितां कुछ

ये तेरे मदहोश करते हैं नैन मुझे

मानो हो कातिलाना अदा कुछ

मुस्कान पे तो मर ही जाएं हम

हूर ने भी पाया जोबन आपसा कुछ

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